व्यक्तितंत्र में बदलता लोकतंत्र! 

इस बार भारत अपनी आज़ादी का 80वां दिवस मनायेगा। लालक़िले की प्राचीर से  प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी 13 वीं बार राष्ट्र को सम्बोधित करेंगे।  उनके नेतृत्व को इसी वर्ष देश की युवा शक्ति ने ज़बरदस्त चुनौती भी दी है। मोदी+ शाह के अभेद्य दुर्ग में इस शक्ति ने सुराख़ भी कर दिया है। राष्ट्र व्यापी युवा आंदोलन ने जनता को ‘भयमुक्त’ कर दिया है; समाज  ‘विध्रुवीकृत’ प्रतीत लग रहा है। चैनलों पर हिन्दू-मुसलमान के टंटे हाशिये पर हैं;  हिंदुस्तान-पाकिस्तान बहसों  पर अर्द्ध विराम लगा है।

लेकिन, इतिहास में शायद पहली दफ़ा संसद का मानसून सत्र लगभग ‘कुरु कुरु स्वाहा’ रहा; दोनों सदनों में हंगामा और बाहर भी  संसद परिसर में सत्ता पक्ष बनाम  विपक्षी प्रदर्शन; मोदी + शाह जोड़ी संसद भवन के अपने कार्यालयों में आती रही, लेकिन  सदन से ‘भगौड़े’ बनी रही। वजह, मोदी+ शाह जोड़ी की हठधर्मिता। इस परिदृश्य में, देश के  लोकतंत्र के दीर्घ जीवन के प्रति चिंतित होना स्वाभाविक है।

वर्तमान सदी का चौथाई भाग बीत चुका  है। विश्व के अधिकांश देश स्वयं को लोकतांत्रिक घोषित करने में गर्व का अनुभव  करते हैं।  भारत स्वयं को लोकतंत्र की जननी मानता है, वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका खुद को सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश घोषित करता है। इस दृष्टि से इजराइल भी पीछे नहीं है।  इस कतार में रूस, चीन और उत्तर कोरिया जैसे देश भी हैं, जिनके शासक लोकतांत्रिक शासन पद्धति का दम्भ भरते रहते हैं।

सारांश में, लोकतंत्र देशों के नेतृत्व वर्गों का ‘शासन धर्म’ बन गया है। लोकतंत्र की माला जपे बग़ैर वे सत्ता में रह नहीं सकते और उनका राजनैतिक अस्तित्व ही संकटग्रस्त हो सकता है। नेतृत्व वर्ग की चिंता यह नहीं है वह वास्तविक लोकतंत्र की कार्य प्रणाली को समझे। वोट के माध्यम से सत्ता पर काबिज़ होना ही उसकी एक मात्र चिंता रहती है। उसका सरोकार मतपेटियों या ईवीएम तक ही सीमित है। लेकिन, वह स्वेच्छा से लोकतंत्र की बहु आयामी कार्यप्रणाली से अनभिज्ञ रहता है। 

सत्ता प्राप्ति ही उसका एकमेव धेय बन जाता है; सामंतवादी शासक, निर्वाचित शासक, जन लोकप्रिय शासक, तानाशाह शासक, सैन्य शासक आदि स्वयं को लोकतंत्र की पोशाक से ढके रखना चाहते हैं। इस दृष्टि से, सभी प्रजाति के शासकों को लोकतंत्र का छाता चाहिए; चरम दक्षिण पंथी और चरम वाम पंथी, दोनों सदृश्य धरातल पर खड़े दिखाई देते रहे हैं; हिटलर व मुसोलिनी ने स्वयं को लोकतंत्रवादी ही माना है; कब स्टालिन और माओ ने स्वयं को  अधिनायकवादी घोषित किया?

क्या मुस्लिम देशों के शाही शासक खुद को तानाशाह कहलवाना पसंद करते हैं? क्या पाकिस्तान में आज तक सच्चा लोकतंत्र क़ायम हो सका है? पांचवें दशक के मध्य से ही फ़ौज़ी हाथों में पाकिस्तान की नकेल है। 

बीसवीं सदी में दो महायुद्धों की निर्मिति लोकतांत्रिक शासकों की देन है। पिछले 26 बरसों में खाड़ी, अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया, रूस-यूक्रेन, भारत-पाक, पाक-अफ़ग़ानिस्तान जैसी जंगों के सूत्रधार सामंती राजा-महाराजा नहीं, जनता द्वारा निर्वाचित शासक रहे हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि मध्ययुग के वंशवादी शासकों की जंग और आधुनिक निर्वाचित शासकों की जंग के चरित्र, प्रवृत्ति और लक्ष्य में आधारभूत अंतर नहीं है।

यह सही है कि शस्त्रों की टेक्नोलॉजी और युद्ध रणनीति में समयानुसार अंतर ज़रूर रहता रहा है। लेकिन, युद्ध निर्मिति की प्रवृत्ति समान-सी रहती है। मिसाल के तौर पर, विश्व के सबसे शक्तिशाली लोकतान्त्रिक देश के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दक्षिण अमेरिका के पिद्दी-से  देश वेनेज़ुएला पर हमला किया, उसके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को बलात बंदी बना कर अमेरिका लाया गया और देश की  तेल सम्पदा पर क़ब्ज़ा कर लिया।

क्या इसे अमेरिका का लोकतांत्रिक व्यवहार कहा जाना चाहिए?  ट्रम्प इसी तरह की डाकाजनी को ईरान के साथ भी दोहराने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका का प्यादा देश इज़राइल भी ग़ज़ा और लेबनान पर अंधाधुंध जंगों का कहर बरपा रहा है। लोकतान्त्रिक प्रणाली से निर्वाचित प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व में इज़राइली सेनाओं ने ग़ज़ा में नरसंहार किया और 70 हज़ार से अधिक लोगों को गोलियों से भून डाला, जिनमें 20 हज़ार मासूम बच्चे भी शामिल हैं। एक लाख से अधिक लोग हताहत हो चुके हैं।

लेबनान में भी हज़ारों लोगों को गोलियों से भूना गया है। ईरान में अमेरिका+इज़राइल बमबारी  में 170 छात्राएं मृत्यु की शिकार हुईं।  मध्ययुग में भी शक्तिशाली बादशाह या राजे-महाराजे  कमज़ोर रियासतों पर हमला कर वहां की सम्पदा को हड़प लिया करते थे। कमज़ोर शासकों को क़ैद कर लिया जाता था। उनकी हत्याएं कर दी जाती थीं। चौथ वसूली किया करते थे।  ठीक उसी तर्ज़ पर  अमेरिका और इज़राइल ने 28 फरवरी को ईरान पर ज़बरदस्त आक्रमण कर उसकी पहली पंक्ति के नेतृत्व का एक ही झटके में सफाया कर दिया। 

स्वयंभू चरम आधुनिकता के देश अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ईरान को मध्ययुगीन भाषा में धमकाते हुए कहते हैं, ”ईरान को पाषाण युग में पहुंचा देंगे। नेस्तोनाबूद कर देंगे।” क्या इस निर्वाचित राष्ट्रपति की भाषा में आधुनिक लोकतंत्र की संवेदनशीलता की गूंज सुनाई देती है? इस भाषा में ट्रम्प बर्बर और मध्यकालीन शासक प्रतीत होते हैं। जब वे अकारण वेनेज़ुएला व ईरान पर हमला करते हैं तब वे इस सदी के ‘मेहमूद ग़ज़नवी और मोहम्मद गोरी’ दिखाई देते हैं।

2003 में अमेरिका के राष्ट्रपति बुश जूनियर ने इराक़ के तत्कालीन शासक सद्दाम हुसैन के साथ भी यही सुलूक किया था। उन्हें मृत्यु दंड दिया गया था क्योंकि उन्होंने अमेरिका के सामने झुकने से इंकार कर दिया था। आधुनिक युग के लोकतांत्रिक देशों के बीच जितने भी युद्ध हुए हैं उनमें जन-सहमति नितांत अनुपस्थित रही है। अमेरिकी जनता के प्रतिरोध और वियतनामी जनता की अभेद्य शक्ति के दबाव में अमेरिकी सेना को हार कर युद्ध क्षेत्र से गृह क्षेत्र लौटना पड़ा था।

क्या इस बार डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान व वेनेज़ुएला पर हमले में जनता की सहमति ली थी? क्या रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग में दोनों देशों की जनता की सहमति है? यदि लोकतंत्र में ‘वीर भोग्य वसुंधरा’ या ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस‘ के सिद्धांत को अपनाया जाता है तब लोकतंत्र मरणासन्न होने लगता है। इसके लक्षण मोदी+शाह शासन में शिद्दत से दिखाई देने लगे हैं। अधिकांश लोकतांत्रिक  संस्थाओं पर संघ परिवार का आधिपत्य दिखाई दे रहा है और धड़ल्ले से बहुसंख्यकवाद का ‘बुलडोज़र’ चलाया जा रहा है। 

इस सदी में कैसे संवैधानिक दस्तानों से आहिस्ता-आहिस्ता लोकतंत्र का गला दबाया जाता है, इसमें आधुनिक शासक निष्णात होते जा रहे हैं। सर्वप्रथम, रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन की शासन शैली पर नज़र दौड़ाएं। पहली बार पुतिन ने 31 दिसंबर, 1999 में  राष्ट्रपति का पद सम्हाला था। तबसे लेकर आज तक इस पद पर चिपके हुए हैं। इस सत्ता- यात्रा में वे चार साल के लिए 2008-2012 की अवधि में एक पायदान नीचे उतर कर प्रधानमंत्री भी रहे।

2012 के बाद से वे लगातार राष्ट्रपति का चुनाव जीतते आ रहे हैं। निकट भविष्य में पुतिन-पतन के आसार दिखाई दे नहीं रहे हैं। अब वे निष्कंटक होकर रूसी साम्राज्य के सर्वेसर्वा बन चुके हैं। रूस में बरायेनाम चुनाव होते हैं। राजसत्ता पर काबिज़ रहने की दृष्टि से  चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी पुतिन के निष्ठावान अनुयायी हैं। 2013 से शी अपने देश के राष्ट्रपति हैं और जब तक चाहें वे इस पद पर रह सकते हैं। राष्ट्रपति के साथ साथ शी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव भी हैं।

साम्यवादी शासन में महासचिव का पद राष्ट्रपति से भी अधिक शक्तिशाली होता है। शी जिनपिंग भी अपने उभरते प्रतिदवंद्वियों को ठिकाने लगाने में माहिर हैं। उनकी पार्टी, शासन और सेना पर मज़बूत पकड़ मानी जाती है। संयोग से, पुतिन और शी, दोनों ही शासक मार्क्सवादी पृष्ठभूमि से हैं, लेकिन व्यवहार सामंती शासक के समान कर रहे हैं। यही स्थिति उत्तर कोरिया के शासक की है। उत्तर कोरिया को साम्यवादी देश माना जाता है, लेकिन तीन पीढ़ियों से वंशवादी शासन चल रहा है; साम्यवादी चोले में वंशवादी एकतंत्रीय शासन व्यवस्था है। 

पूंजीवादी लोकतांत्रिक देशों के निर्वाचित शासकों की स्थिति भी बेहतर कहीं नहीं जा सकती। इस सन्दर्भ में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की शासन शैली को भी विशुद्ध लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। बारह वर्षीय मोदी-राज में भारत लोकतंत्र तालिका में नीचे की तरफ फिसलता जा रहा है; चुनावी एकतंत्र की दृष्टि से भारत का स्थान 179 देशों में 105 वां स्थान है। 2014 में मोदी ने अपनी प्रधानमंत्री-यात्रा को शुरू किया था। इस 12 सालों की अवधि में उन्होंने एक दफ़ा भी प्रेस वार्ता नहीं की है।

किसी भी लोकतंत्र में शासक और मीडिया के बीच प्रेस वार्ता जीवंत सेतु की भूमिका निभाती आई है। मोदी के पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक प्रेस वार्ता किया करते थे, लेकिन मोदी इससे पलायन करते आ रहे हैं।

उनकी कोशिश विभिन्न तिकड़मों (नोटबंदी, चुनाव चोरी, चुनावी बॉन्ड, एसआईआर, सांसद-विधायकों की ख़रीद फ़रोख़्त, विरोधी शासित राज्यों में राज्यपालों द्वारा हस्तक्षेप, ईडी, सीबीआई का इस्तेमाल, भाजपा की वाशिंग मशीन, कांग्रेस मुक्त व विपक्ष मुक्त भारत की कोशिश, ध्रुवीकरण, गोदी मीडिया, अघोषित आपातकाल आदि) के माध्यम से लोकतंत्र को एकतंत्रीय शासन शैली में तब्दील करने की रहती है।

संविधान है, लेकिन क्या उसका शतप्रतिशत पालन हो रहा है? संघ परिवार का विराट स्वप्न है संविधान में आमूलचूल परिवर्तन और तद्नुसार ‘हिन्दू राष्ट्र’ का निर्माण।  

अमेरिका के  राष्ट्रपति ट्रम्प ने 2024 के चुनावों  में नारा उछाला था ‘अमेरिका को फिरसे महान बनाएं लेकिन, ट्रम्प की  खिलंदड़ी शासन शैली की वजह से उनका देश महान बनने के स्थान पर अब उसकी एक ध्रुवीय सत्ता पर ग्रहण ज़रूर लग चुका है। अमेरिका के साथ तुलनात्मक दृष्टि से, एशिया का छोटा व निर्बल देश ईरान उसके सामने चट्टान बन कर खड़ा हुआ है। ईरान, हमलावर अमेरिका पर लगातार प्रतिआक्रमण करता जा रहा है। आत्मकेंद्रित व आत्ममुग्ध ट्रम्प के होश उड़ चुके हैं।

यही स्थिति इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू की है। वह अपने देश में ज़बरदस्त अलोकप्रिय हैं। भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। जनता का विरोध बढ़ता जा रहा है। लेकिन, ‘ग्रेटर इज़राइल प्रोजेक्ट‘ के नाम पर उन्होंने लोकतंत्र को जेबी लोकतंत्र बना डाला है। मुख़्तसर से, आज मोदी+ट्रम्प+नेतन्याहू त्रिमूर्ति ‘निर्वाचित एकतंत्रीय सत्ता‘ की प्रतीक बन चुकी है। 

लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ  वोट देना ही नहीं है, बल्कि हर दृष्टि से व्यक्ति, राष्ट्र और राजसत्ता की व्यवहार शैली को लोकतांत्रिक बनाना है। एक राष्ट्र राज्य अपनी सेना व सम्पति के बल पर स्वयं को ‘महान‘ घोषित कर सकता है। लेकिन, उसका देश के आम नागरिक के साथ कैसा व्यवहार है, उससे उसकी महानता परिभाषित होती है। यह कसौटी है महानता की, जिसे महात्मा गांधी ने रेखांकित किया था। 

लोकतंत्र को ‘वोटतंत्र’ तक ही सीमित न रखें।  इसे व्यक्तिकेंद्रित, एकतंत्रीय और कुलीन तंत्रीय में परिवर्तित होने से रोकें। सारांश में, लोकतंत्र का लोकतांत्रीकरण करें और’ इसे ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखायवादी ’ बनाएं।

(रामशरण जोशी वरिष्ठ लेखक-विचारक हैं।)

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